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अक्सर कहा जाता है कि बच्चे माँ की गोद में बोलना सीखते हैं, लेकिन पिता के कंधों पर बैठकर दुनिया को समझते हैं। परवरिश सिर्फ़ प्यार देने या जरूरतें पूरी करने का नाम नहीं है यह समय, संवाद और स्नेह की साझेदारी है। समाज में बच्चों की देखभाल को ज़्यादातर माँ से जोड़ा जाता है, ऐसे में पिता की भूमिका पर बात करना बेहद ज़रूरी है। यह ब्लॉग इसी विषय पर केंद्रित है कि जब पिता बच्चे की परवरिश में सक्रिय रूप से जुड़ते हैं, तो इससे बच्चे की भाषा, सोच, आत्मविश्वास और सामाजिक समझ कैसे विकसित होती है। हम ‘परवरिश’ और ‘बोल साथी’ जैसे कार्यक्रमों के उदाहरणों के ज़रिए यह भी जानेंगे कि कैसे पिता की भागीदारी ने परिवारों में नए संवाद और अपनेपन की शुरुआत की है। क्योंकि आखिर में, परवरिश का असली अर्थ यही है मिलकर बच्चे के साथ बढ़ना, सीखना और जुड़ना।

पिता बच्चे के जीवन में पहले शिक्षक की भूमिका निभाते हैं। जैसे-जैसे बच्चा बड़ा होता है, वह अपने पिता के व्यवहार, बोलने के ढंग, काम करने के तरीके और लोगों से जुड़ने की शैली को ध्यान से देखता और सीखता है। पिता से बच्चा सिर्फ़ बातें नहीं सीखता, बल्कि जीवन जीने का नज़रिया सीखता है कैसे मुश्किलों का सामना करना है, कैसे आत्मविश्वास के साथ अपनी बात रखनी है और कैसे दुनिया को समझना है। एक बच्चे के जीवन में पिता वह पहले व्यक्ति होते हैं जो बच्चे को घर की चारदीवारी से बाहर की दुनिया से परिचित कराते हैं। जब पिता बच्चे को हाथ पकड़कर बाहर ले जाते हैं बाज़ार, खेत, सड़क या पार्क में तो बच्चा दुनिया को देखने और समझने की नई शुरुआत करता है। वह सीखता है कि लोग कैसे बात करते हैं, काम कैसे होता है और समाज किस तरह जुड़ा है।

माँ जहाँ बच्चे को स्नेह, सुरक्षा और भावनात्मक मजबूती देती हैं, वहीं पिता बच्चे को अनुभव, दिशा और आत्मविश्वास प्रदान करते हैं। पिता के सान्निध्य में बच्चा यह समझना शुरू करता है कि गलतियाँ करना भी सीखने का हिस्सा है और प्रयास करते रहना ही सफलता की कुंजी है। यही सीख जीवनभर उसके साथ रहती है। हमारे समाज में लंबे समय से यह धारणा बनी रही है कि पिता का मुख्य कार्य घर चलाने के लिए आर्थिक जिम्मेदारियाँ निभाना है, जबकि बच्चे की परवरिश और देखभाल की ज़िम्मेदारी माँ की होती है। लेकिन आज यह सोच धीरे-धीरे बदल रही है। अब यह साफ़ हो रहा है कि बच्चे के सर्वांगीण विकास के लिए पिता की सक्रिय भागीदारी उतनी ही आवश्यक है जितनी माँ की उपस्थिति।
जब पिता अपने बच्चे के साथ समय बिताते हैं उसके साथ खेलते हैं, बातें करते हैं, कहानियाँ सुनते हैं या बस साथ बैठकर उसकी दुनिया को समझते हैं तो बच्चा न केवल भावनात्मक रूप से मज़बूत होता है बल्कि उसकी भाषा, सोच और सामाजिक कौशल भी विकसित होते हैं। पिता की सहभागिता से बच्चे को एक सुरक्षित आधार मिलता है, जिससे वह आत्मविश्वास के साथ नए अनुभवों की ओर बढ़ पाता है।
विभिन्न अध्ययनों में यह पाया गया है कि जिन बच्चों के पिता सक्रिय रूप से उनकी परवरिश में शामिल रहते हैं, वे अधिक रचनात्मक, आत्मविश्वासी और संवेदनशील बनते हैं। उनमें निर्णय लेने की क्षमता बेहतर होती है और वे दूसरों के साथ अधिक सहयोगी व्यवहार करते हैं। इसलिए यह कहना बिल्कुल उचित होगा कि पिता सिर्फ़ परिवार के पालनहार नहीं, बल्कि बच्चे के पहले मार्गदर्शक, जीवन-शिक्षक और प्रेरक होते हैं।
बच्चे के समग्र विकास के लिए माता और पिता दोनों की भागीदारी बेहद ज़रूरी है। जहाँ माँ बच्चे में स्नेह, संवेदनशीलता और सुरक्षा की भावना विकसित करती है, वहीं पिता उसे आत्मनिर्भरता, अनुशासन और बाहरी दुनिया से जुड़ने के अवसर प्रदान करते हैं। जब बच्चा दोनों के साथ खेलता है, बातचीत करता है और समय बिताता है, तो उसके भीतर सोचने-समझने (संज्ञानात्मक), भावनात्मक और सामाजिक कौशलों का संतुलित विकास होता है। माता-पिता के अलग-अलग लेकिन पूरक तरीक़े बच्चे को दुनिया को समझने, निर्णय लेने और आत्मविश्वास से आगे बढ़ने की क्षमता देते हैं। इस तरह पिता और माता मिलकर बच्चे के लिए एक ऐसा माहौल तैयार करते हैं जहाँ सीखना, स्नेह और अनुशासन तीनों का संतुलन बना रहता है।
फील्ड विज़िट और अनुभवों से यह स्पष्ट हुआ कि अधिकांश पिता आंगनवाड़ी केंद्र (AWC) को महिलाओं और बच्चों का केंद्र मानते हैं। इसका परिणाम यह होता है कि वे अक्सर अपनी उपस्थिति को अनिवार्य नहीं समझते या अपनी भूमिका को सीमित मानते हैं। इसके अलावा, काम और समय की प्राथमिकताओं के कारण उनकी नियमित भागीदारी में भी बाधाएँ आती हैं। कई बार पिता बच्चों की परवरिश को लेकर चिंतित होते हैं, लेकिन पर्याप्त जानकारी और संसाधनों की कमी के कारण पारंपरिक परवरिश प्रथाओं का ही पालन करते रहते हैं। कुछ पिता की सोच परवरिश को लेकर अलग होती है, और ऐसे पिता बैठकों और मार्गदर्शन से अपने दृष्टिकोण में सकारात्मक बदलाव अनुभव करते हैं।

पिता की भागीदारी के अनुभव विविध रहे। कुछ पिता उत्साही और सक्रिय रूप से बच्चों की गतिविधियों में शामिल होते हैं, जबकि कुछ केवल सीमित रूप से ही भाग ले पाते हैं। जिन्होंने सक्रिय रूप से भाग लिया, उन्होंने देखा कि बच्चों के साथ समय बिताने से न केवल मज़ा आता है, बल्कि उनकी भाषा, सोच और रचनात्मकता में भी सुधार होता है। इसके अलावा, जब पिता बच्चों के खेल, कहानियों और अन्य गतिविधियों में शामिल होते हैं, तो बच्चों का आत्मविश्वास बढ़ता है और वे अधिक सुरक्षित महसूस करते हैं। पिता के साथ समय बिताने से बच्चों में निर्णय लेने की क्षमता, सामाजिक समझ और भावनात्मक सुरक्षा भी विकसित होती है। इस अनुभव ने यह स्पष्ट किया कि पिता की भागीदारी केवल बच्चों की सीखने की प्रक्रिया तक सीमित नहीं है, बल्कि उनके संज्ञानात्मक, भावनात्मक और सामाजिक विकास में भी महत्वपूर्ण योगदान देती है। इसलिए, फील्ड में यह ज़रूरी है कि पिता को सक्रिय रूप से प्रोत्साहित किया जाए और उन्हें समझाया जाए कि उनकी उपस्थिति और सहभागिता बच्चे की परवरिश और सीखने की प्रक्रिया में कितना प्रभावशाली हो सकती है।
पिताओं को जोड़ने की रणनीतियाँ:

पिता को बैठक में शामिल करने के लिए एक व्यवस्थित रणनीति अपनाई गई। सबसे पहले, आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं के साथ बातचीत की गई ताकि यह समझा जा सके कि वर्तमान में पिता की प्रतिक्रिया कैसी है, उन्हें कैसे आमंत्रित किया जाता है और उनकी उपस्थिति की स्थिति क्या है। आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं के अनुसार, पिता की उपस्थिति आम तौर पर कम रहती है और उनकी भागीदारी सीमित होती है। इसके बाद, पिता से सीधे संवाद शुरू करने से पहले माता के लिए एक प्रारंभिक बैठक आयोजित की गई। इस बैठक में माताओं ने अपने देखभाल के अनुभव साझा किए और पिता की भागीदारी के महत्व पर चर्चा की। इससे यह सुनिश्चित हुआ कि पिता को शामिल करने के महत्व को पहले परिवार के भीतर समझाया जा सके और उन्हें प्रेरित किया जा सके। पिता से संवाद करते समय उनकी पेशेवर प्रतिबद्धताओं और समय की उपलब्धता का ध्यान रखा गया। बैठकें सुबह या शाम के समय आयोजित की गईं, ताकि उनकी भागीदारी सुनिश्चित की जा सके। इन बैठकों में बच्चों की परवरिश में पिता की भूमिका, उनके सामने आने वाली चुनौतियाँ और उन्हें हल करने के संभावित उपायों पर चर्चा की गई। साथ ही, पिता की भावनाओं, सोचने के तरीकों और दृष्टिकोण को समझने का प्रयास किया गया। इस व्यवस्थित प्रक्रिया का उद्देश्य यह था कि पिता की भागीदारी केवल औपचारिक न रहकर, सक्रिय और सार्थक बने ताकि वे बच्चों के बौद्धिक, भावनात्मक और सामाजिक विकास में प्रभावी भूमिका निभा सकें और परवरिश में अधिक आत्मविश्वास व जिम्मेदारी के साथ शामिल हो पाएं।
पिताओं के अनुभव: बच्चों के साथ समय बिताने और सीखने की प्रक्रिया:

बच्चों के विकास में माता-पिता की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण होती है, हमारी टीम द्वारा आयोजित पिताओं की बैठक में यह बात स्पष्ट रूप से सामने आई कि बच्चों के विकास में पिता की भूमिका कितनी गहरी और प्रभावशाली होती है। अधिकांश पिताओं ने अपने अनुभव साझा करते हुए बताया कि वे अपने बच्चों के साथ किस तरह समय बिताते हैं, कोई उन्हें घुमाने ले जाता है, कोई खेल खेलता है, कोई तैयार करने में मदद करता है, तो कोई पढ़ाई में साथ देता है। पिताओं ने साझा किया कि उनके लिए सबसे बड़ी चुनौती समय की कमी है। काम की वजह से वे दिनभर बाहर रहते हैं, जिसके कारण सुबह और शाम का समय ही बच्चों के साथ बिताना संभव हो पाता है। कई बार तो देर रात घर लौटने पर बच्चे सो चुके होते हैं और सुबह जल्दी निकलने पर उनसे मुलाकात भी नहीं हो पाती। इसलिए दिनभर बातचीत और खेल का समय सीमित रहता है। कई पिताओं ने कहा अक्सर बच्चे हमसे सिर्फ़ ज़रूरत की बातें करते हैं या मोबाइल में ही व्यस्त रहते हैं। ऐसे में समझ नहीं आता कि उनसे खुलकर कैसे बात करें या उन्हें हमारे साथ जोड़ें।

बैठक में बोल साथी और परवरिश प्रोग्राम के माध्यम से बच्चों के साथ की जाने वाली छोटी-छोटी गतिविधियाँ, कहानियाँ, संवाद और वाक्यों को पूरा करने जैसे तरीकों के बारे में बताया गया। ये सभी अभ्यास बच्चों के भाषा विकास और आत्मविश्वास को बढ़ाते हैं। पिताओं ने माना कि इन सरल अभ्यासों से उनके और बच्चों के बीच का रिश्ता और मज़बूत होगा, और बातचीत अधिक अर्थपूर्ण व आनंददायक बनेगी।
बैठक में खेल और कहानियों के ज़रिए बच्चों की सीख और भावनात्मक विकास के महत्व पर चर्चा हुई। पिताओं ने माना कि बच्चों के साथ स्नेह, बातें और खेल ही उनके मानसिक, भाषाई और सामाजिक विकास की असली नींव हैं। बैठक में दिखाए गए बोल साथी/परवरिश प्रोग्राम, वीडियो, ऑडियो और कहानी बनाने की गतिविधियाँ पिताओं को अत्यंत उपयोगी लगीं। उन्होंने बच्चों के साथ इन गतिविधियों को घर पर आज़माने की उत्सुकता जताई और भविष्य में भी ऐसे सत्रों में भाग लेने का आश्वासन दिया।
‘पापा की पाठशाला’ गतिविधि के माध्यम से पिताओं को अन्य पिताओं के बेहतरीन अनुभवों और अभ्यासों से सीखने का अवसर मिला। इससे उन्हें यह समझने में मदद मिली कि हर पिता-बच्चे का रिश्ता अनोखा होता है और संवाद, स्नेह व साथ बिताया गया समय उस रिश्ते को और गहराई देता है। कई पिताओं ने साझा किया कि वे अब अपने बच्चों को केवल निर्देश देने तक सीमित नहीं रहना चाहते, बल्कि उन्हें समझने, प्रोत्साहित करने और उनकी भावनाओं से जुड़ने का प्रयास कर रहे हैं। साथ ही, उन्होंने यह भी माना कि माताओं के साथ तालमेल और सहयोग बच्चे के समग्र विकास की सबसे मज़बूत नींव है।
बच्चों के बेहतर विकास के लिए यह जरूरी नहीं है कि उन्हें महंगे खिलौने या किसी विशेष तरह का ट्रीटमेंट दिया जाए। घर पर ही उपलब्ध साधारण घरेलू सामानों का उपयोग करके भी बच्चे के साथ गुणवत्तापूर्ण समय बिताया जा सकता है। बोल साथी और परवरिश प्रोग्राम में बताए गए गतिविधियों को अपनाकर माता-पिता अपने बच्चों के साथ रोज़ाना कम से कम 10-15 मिनट बिताएँ। इस दौरान छोटे-छोटे खेल, कहानी सुनाना, संवाद करना और बच्चों को अपने विचार व्यक्त करने के लिए प्रोत्साहित करना बहुत महत्वपूर्ण है। बातें, स्नेह और खेल ये तीनों तरीके बच्चे के मानसिक, भाषाई और सामाजिक विकास के लिए बेहद जरूरी हैं। इन सरल गतिविधियों को अपनाने से बच्चे के साथ माता-पिता का रिश्ता मज़बूत होता है और बच्चे सीखने, समझने और आनंद लेने में सक्रिय रहते हैं।

निष्कर्ष:
बच्चों के जीवन में पिता की भागीदारी उनके समग्र विकास के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। जब पिता खेल, बातचीत या कहानी सुनाने जैसी गतिविधियों में शामिल होते हैं, तो इससे बच्चों में आत्मविश्वास, रचनात्मकता, भाषा कौशल और भावनात्मक सुरक्षा विकसित होती है। फील्ड के अनुभव बताते हैं कि पिता द्वारा बच्चों के साथ बिताया गया थोड़ा-सा गुणवत्तापूर्ण समय भी उनके विकास पर गहरा और स्थायी प्रभाव डालता है।
परवरिश और बोल साथी जैसे कार्यक्रम माता-पिता दोनों के लिए ऐसे साधन हैं, जो उन्हें बच्चों की परवरिश में सक्रिय भूमिका निभाने में मदद करते हैं। पिताओं को जब प्रोत्साहन और व्यावहारिक मार्गदर्शन मिलता है, तो वे सीखने की प्रक्रिया में अधिक आत्मविश्वास से भाग लेते हैं। माताओं के साथ उनकी यह साझेदारी परिवार के माहौल को और सहयोगी व संतुलित बनाती है। अंततः, पालन-पोषण एक साझा यात्रा है जहाँ पिता और माता मिलकर बच्चे को दिशा, सहयोग और प्रेरणा देते हैं। पिता की उपस्थिति और सहभागिता केवल सहायक नहीं, बल्कि एक आत्मविश्वासी, जिज्ञासु और भावनात्मक रूप से सशक्त बच्चे के निर्माण की आधारशिला है।